परिचय ::


आवास - कोसल संस्कृत समिति तथा पाणिनीय शोध संस्थान, आर्य समाज के पास, गोंड़पारा, बिलासपुर (छ.ग.)
सम्पर्क - 07752-227815 / 094255-42292 / 091318-43660
जन्मतिथि - 1 जुलाई 1972 । जन्मस्थान - जबलपुर (म.प्र.)
पिता - प्राणाचार्य पण्डित सुन्दरलाल शुक्ल । माता - श्रीमती जानकी देवी शुक्ल
पति - प्रो. शिवप्रसाद दीक्षित
शैक्षणिक योग्यता - एम. ए. संस्कृत (तीन स्वर्णपदक प्राप्त)। पी. एच. डी. (रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर)
पद - सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं संस्कृत विभागाध्यक्ष
महाविद्यालय - अध्यापन का अनुभव - 39 वर्ष । शोधकार्य का अनुभव - 28 वर्ष

गुरु परम्परा

प्राणाचार्य पण्डित सुन्दरलाल जी शुक्ल

वैयाकरणशिरोमणि आचार्य विश्वनाथ जी त्रिपाठी

आचार्य डॉ. बच्चूलाल जी अवस्थी 'ज्ञान'

आचार्य डॉ. पं. रामयत्न जी शुक्ल

व्याकरणशास्त्र में क्रान्ति : 'पाणिनीया पौष्पी प्रक्रिया'


भारत की संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है। इसका सारा वाङ्मय संस्कृत भाषा में निबद्ध है। संस्कृत भाषा को जाने बिना इसे नहीं जाना जा सकता, और इसे जाने बिना भारत और भारतीयता को नहीं जाना जा सकता। अत: हमारी पैतृक सम्पत्तियों में सबसे बहुमूल्य रत्न हमारी संस्कृतभाषा है। संस्कृत भाषा को जानने के लिये पाणिनीय व्याकरण का ज्ञान अनिवार्य है। लौकिक,वैदिक उभय शब्दों का साधक होने के कारण वेदों की रक्षा का उपायभूत पाणिनीय व्याकरणशास्त्र सारे वेदाङ्गों में प्रधान है।
विश्व में इस पाणिनीय व्याकरण को पढ़ने की दो पद्धतियाँ प्रचलित हैं। एक तो पाणिनीय अष्टाध्यायी के सूत्रों के अर्थों को पाणिनीय अष्टाध्यायी के क्रम से ही पढऩा। यह मार्ग महाभाष्य से प्रारम्भ होकर काशिकावृत्ति तक चलता है। स्वामी दयानन्द के मार्ग में भी यद्यपि अष्टाध्यायी को काशिका के क्रम से पढ़ाते हैं.इससे अष्टाध्यायी के सूत्रक्रम का ज्ञान तो हो जाता है,किन्तु प्रक्रिया के लिये यहाँ भी नामिक, आख्यातिक आदि ग्रन्थ बनाकर सिद्धान्तकौमुदी के समान लक्ष्यानुसारी क्रम का ही आश्रय लिया जाता है,इसलिये प्रक्रिया में यहाँ भी सिद्धान्तकौमुदी का ही अनुसरण है, नवीन कुछ भी नहीं। प्रक्रिया की जटिलता ज्यों की त्यों है,क्योंकि अष्टाध्यायी प्रक्रियाग्रन्थ है ही नहीं। पूरी अष्टाध्यायी को यथाक्रम रटकर भी एक भी शब्द सिद्ध नहीं किया जा सकता। अधिकार,अनुवृत्ति और सूत्रों का पूर्वापर विज्ञान 'अष्टाध्यायी'के प्राण हैं। इन्हें एक बार 'अष्टाध्यायी'से ही समझ लेने से 'अष्टाध्यायी'का विज्ञान तो स्पष्ट हो जाता है,किन्तु प्रक्रिया में प्रवेश नहीं हो पाता है।
दूसरी पद्धति है प्रक्रियापद्धति,जिसका सर्वप्रामाणिक ग्रन्थ सिद्धान्तकौमुदी है। इसी को आधार बनाकर आगे शेखर आदि प्रौढ़ ग्रन्थ लिखे गये हैं। ये सिद्धान्तकौमुदी आदि प्रक्रियाग्रन्थ पहिले 'प्रयोग'को सामने रख लेते हैं। उस प्रयोग के लिये सारे सूत्र लाकर वहाँ खड़े कर देते हैं। इससे 'अष्टाध्यायी'की व्यवस्था भग्न होती है,वृत्तियाँ रटना पड़ती हैं और १२ वर्ष तक प्रयोग बनाते रहने पर भी प्रक्रिया का विज्ञान समझ में नहीं आता।
डॉ. पुष्पा दीक्षित ने लगभग ४० वर्षों के तप से 'पाणिनीय अष्टाध्यायी'के प्रक्रियाविज्ञान को स्पष्ट करने वाली एक ऐसी सर्वथा नवीन गणितीय विधि आविष्कृत की है,जिससे 'अष्टाध्यायी' का समग्र प्रक्रियाविज्ञान चार मास में हृद्गत हो जाता है। पाणिनि के बाद से लेकर अभी तक ३५०० वर्षों में पाणिनि को किसी ने इस प्रकार व्याख्यात नहीं किया है। वस्तुत: पाणिनि का शास्त्र गणितीय विधि पर आश्रित है,और पुष्पा दीक्षित ने उस गणितीय विधि का आविष्कार किया है,यह वस्तुत: एक बहुत बड़ा क्रान्तिकारी कदम है कि उन्होंने परम्परा से चले आने वाले लकारों के प्रचलित अकारादि क्रम को तोड़कर पाणिनीयविज्ञानानुसार उसके दो हिस्से कर दिये हैं और सार्वधातुक आर्धधातुक प्रत्ययों को अलग अलग कर दिया है। पाणिनीय धातुओं में से एक भी धातु को कम किये बिना पाणिनीय धातुपाठ के सारे धातुओं को भी प्रक्रिया के क्रम से पुनर्व्यवस्थित करके उन्हें प्रक्रिया से सटा दिया है। इस प्रक्रिया का नाम 'पाणिनीया पौष्पी प्रक्रिया' है।

अन्ताराष्ट्रिया एवं राष्ट्रिय स्तर की संस्कृत संगोष्ठियों में शोधपत्रवाचन तथा संस्कृत कवि समवायों में प्रतिभागिता


अखिल भारतीय स्तर की विभिन्न संगोष्ठियों में शताधिक शोध पत्रों का वाचन किया है। जिनमें से अनेक शोधपत्र प्रकाशित हैं। अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन (आल इण्डिया ओरिएण्टल कान्फ़्रेन्स) जो प्रति दो वर्ष में राष्ट्र के भिन्न भिन्न स्थानों पर होता है,में नियमित सदस्य के रूप में सक्रिय भाग लेती हैं। पुष्पा दीक्षित ने प्रत्येक सम्मेलन में भाषा विज्ञान और व्याकरण पर नियमित रूप से शोधपत्र पढ़े हैं। दिल्ली, सागर, इलाहाबाद, वाराणसी, लखनऊ आदि देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में आयोजित सेमीनार में आपकी सक्रिय प्रतिभागिता होती रही है।
प्राय: सभी अखिल भारतीय संस्कृत कवि सम्मेलनों में आप आमन्त्रित रहती हैं। उल्लेखनीय है कि 13 वें विश्व संस्कृत सम्मेलन जो स्काटलैण्ड के एडिनबरा विश्वविद्यालय में आयोजित था उसमें काव्यपाठ के लिये भारत से 15 राष्ट्रिय संस्कृत कवियों का चयन किया गया था। उन १५ मूर्धन्य कवियों में एक नाम डॉ. पुष्पा दीक्षित का भी था।

छत्तीसगढ़ में दो संस्कृत विद्यालयों की स्थापना


डॉ. पुष्पा दीक्षित ने स्थानीय लोगों के सहयोग से वर्ष 2002 में ग्राम अड़भार, पेण्ड्रा जिला बिलासपुर में एक संस्कृत विद्यालय 'वासुदेव वैदिक संस्कृत विद्यापीठ' की स्थापना की है। इसके छात्रों के लिये नि:शुल्क भोजन आवास शिक्षण आदि की व्यवस्था जनसहयोग से की जा रही है। इस संस्था की संरक्षक एवं अध्यक्षा डॉ. पुष्पा दीक्षित हैं, जिनके सत्प्रयासों से संस्था सुचारु रूप से कार्यरत है।

आपके ही सत्प्रयासों से 2004 में महामाया ट्रस्ट रतनपुर द्वारा एक वैदिक संस्कृत विद्यालय की स्थापना की गयी है। 'संस्कृत की रक्षा से राष्ट्र की रक्षा' इस आदर्श को लेकर उन्होंने सारा जीवन बिताया है। अत: आचार्या पुष्पा दीक्षित का समग्र जीवन संस्कृत के लिये समर्पण का एक ज्वलन्त उदाहरण है।

संस्कृत के हित में सतत कार्य


कोसल संस्कृत समिति की अध्यक्षा श्रीमती डॉ. पुष्पा दीक्षित संस्कृत भाषा के प्रति सर्वतोभावेन समर्पित हैं। उनके द्वारा शासन का ध्यान निरन्तर संस्कृत भाषा के उन्नयन और नीति निर्धारण के विषय में आकर्षित किया जाता है।
आपका एक अपना लगभग 10000 पुस्तकों का पुस्तकालय है जिसमें संस्कृत वाङ्मय की पुस्तकें हैं जहाँ आकर शोधच्छात्र अपने विषयों से सम्बन्धित पुस्तकों का अवलोकन कर सकते हैं।
जन साधारण में संस्कृत की रुचि बढ़ाने के लिये, संस्कृत भाषा के प्रति जागरूकता बढाने के लिये वे निरन्तर गीतापाठ, स्तोत्रपाठ तथा शुद्ध संस्कृत उच्चारण की शिक्षा स्थानीय लोगों को नि:शुल्क देती रहती हैं। रामायण, गीता और भागवत के प्रवचनों के माध्यम से भी आप लोगों को संस्कृत भाषा के प्रति जागरूक करती रहती हैं। आपका विश्वास है कि संस्कृत से ही भारत की पहिचान है अत: संस्कृत भाषा को जन जन तक पहुँचाना ही आपके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है।

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